
श्री वैष्णो देवी चालीसा का संपूर्ण हिंदी पाठ यहां पढ़ें।
चालीसा पाठ
दोहा
नमो नमो वैष्णो भवानी, जय जय जग की मात।
दुःख विपदा सब दूर करो, विनती सुनहु साक्षात्॥
त्रिकुटा पर्वत वास है, करहु भक्त कल्यान।
चरन कमल की प्रीति दे, दीजै विमल सुज्ञान॥
चौपाई
जय जय जय वैष्णो महारानी। आदि शक्ति तुम जग कल्यानी॥ १ ॥
त्रिकुटा पर्वत आसन थारो। तीन पिण्ड में रूप निहारो॥ २ ॥
महालक्ष्मी महाकाली रूपा। महासरस्वती ज्ञान अनूपा॥ ३ ॥
तीनों देविन तेज मिलाया। वैष्णो रूप जगत में आया॥ ४ ॥
कटरा निकट गुफा तुम्हारी। जहाँ विराजत हो महतारी॥ ५ ॥
रत्न सिंहासन सोहै नीका। मस्तक पर चमके वर टीका॥ ६ ॥
सजी चुनरिया लाल विशाला। गले बीच सोहै मुक्ता माला॥ ७ ॥
सिंह सवारी कर तुम आती। दुष्टन के मन में भय भरती॥ ८ ॥
श्रीधर ब्राह्मण ने सुमिराया। तब तुमने भण्डारा रचवाया॥ ९ ॥
भैरव नाथ भयो अभिमानी। तब तुम कीन्हा चरित भवानी॥ १० ॥
बाणगङ्गा पर बाण चलाया। चरण पादुका चिह्न बनाया॥ ११ ॥
अर्द्धकुमारी गुफा सुहाई। नौ महीने वहाँ कीन्ह विहाई॥ १२ ॥
भैरव का सिर काट गिराया। शीश गयो पर्वत पर धाया॥ १३ ॥
भैरव को वरदान दिया तब। नाम तिहारे सुमिरे जो सब॥ १४ ॥
जो जन तुमरो ध्यान लगावै। सो नर सब सुख सम्पति पावै॥ १५ ॥
दरिद्रता सब दूरि भगावै। अमृत रस घर में बरसावै॥ १६ ॥
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला। जब लगि जियौ दया फल पाला॥ १७ ॥
अष्टभुजी तुम रूप अनूपा। ज्ञान दीप जग सुखद स्वरूपा॥ १८ ॥
करहु कृपा माँ मो पर भारी। बिपति नसावहु विघ्न बिदारी॥ १९ ॥
नाथ सकल सुख सम्पति दीजै। संकट हरन दया अब कीजै॥ २० ॥
तुमरी महिमा को जग जानै। सुर मुनि सब तुमको सरहानै॥ २१ ॥
विघ्न विनासन मङ्गलकारी। जय जय जय वैष्णो सुखकारी॥ २२ ॥
जो यह पाठ करै चित लाई। ताकी बिपति सब दूरि जाई॥ २३ ॥
रामदास धरि ध्यान तिहारो। संकट में प्रभु तुमहिं संभारो॥ २४ ॥
करहु कृपा बाबा कल्याना। दीजै मोहिं विद्या अरु ज्ञाना॥ २५ ॥
विघ्न हरन मङ्गल के दाता। तुम ही मेरे भाग्य विधाता॥ २६ ॥
जय जय जय वैष्णो माता। पाठ समाप्त भयउ सुख दाता॥ २७ ॥
संतत सम्पति तुमरी दासी। पाप ताप सब दूरि बिलासी॥ २८ ॥
नित्य पाठ जो करैं तुम्हारा। सो नर पावै भव सों पारा॥ २९ ॥
प्रेम भक्ति सों जो जस गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै॥ ३० ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताको छुटि जाई॥ ३१ ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन कृपा तुम्हारी॥ ३२ ॥
आशा तृष्णा विपत सतावै। मोह मदादिक सब बिनसावै॥ ३३ ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौ इकचित तुम्हें भवानी॥ ३४ ॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥ ३५ ॥
वैष्णो चालीसा जो गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥ ३६ ॥
देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३७ ॥
जय जय जय जगदम्ब भवानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३८ ॥
सकल मनोरथ पूरण कीजै। दासन को वर अभय दीजै॥ ३९ ॥
ज्ञान प्रकाश करहु तुम माई। जय जय जय वैष्णो भवानी सहाई॥ ४० ॥
दोहा
वैष्णो चालीसा विमल यह, जो जन करैं विचार।
तिन्ह कहँ सब सुख सम्पति मिलै, उपजै बुद्धि अपार॥
सुंदर दास दास को जानि, कीजै प्रभु कल्यान।
संकट हरन मङ्गल करन, दीजै विद्या ज्ञान॥
॥ इति श्री वैष्णो देवी चालीसा समाप्त ॥
