
श्री संतोषी माता चालीसा का संपूर्ण हिंदी पाठ यहां पढ़ें।
चालीसा पाठ
दोहा
बंदौ संतोषी चरण, रिद्धि-सिद्धि की खानी।
कल्याण करो मात तुम, जानि आपनी दानी॥
सुख-संपत्ति की दातारी, संकट हरन कृपाल।
जय जय संतोषी माता, करहु जनन प्रतिपाल॥
चौपाई
जय संतोषी मात भवानी। जन-जन के मन की तुम जानी॥ १ ॥
गणपति की तुम सुता सुहावन। रिद्धि-सिद्धि से उपजी पावन॥ २ ॥
रूप मनोहर अतिशय प्यारा। जाकी महिमा अपरम्पारा॥ ३ ॥
मस्तक पर मणि मुकुट विराजे। कर में त्रिशूल महाछवि साजे॥ ४ ॥
कंचन वसन लाल चमकीले। दिव्य आभूषण अति गठीले॥ ५ ॥
मंद हास मुख पर छवि न्यारी। भक्तन के संकट हरी भारी॥ ६ ॥
गुड़ और चना भोग मन भावे। जो श्रद्धा से तुमको चढ़ावे॥ ७ ॥
शुक्रवार व्रत जो कोई करई। ताके घर सुख-संपत्ति भरई॥ ८ ॥
खटाई जो जन दूर भगावे। सो नर मनवांछित फल पावे॥ ९ ॥
कथा तुम्हारी जो जन गावे। दुःख दरिद्र निकट नहीं आवे॥ १० ॥
बहू-बेटिन पर कृपा तुम्हारी। राखी लाज तुम बिनती स्वीकारी॥ ११ ॥
सास-जेठानी त्रास मिटायो। भूखे घर में अन्न पहुंचायो॥ १२ ॥
सत्यवान की कथा सुहाई। जैसे तुमने विपत मिटाई॥ १३ ॥
वैसी कृपा करो सब पर माता। तुम ही सबकी भाग्य विधाता॥ १४ ॥
जो जन तुमरो ध्यान लगावै। सो नर सब सुख सम्पति पावै॥ १५ ॥
दरिद्रता सब दूरि भगावै। सुख शांति घर में लै आवै॥ १६ ॥
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला। जब लगि जियौ दया फल पाला॥ १७ ॥
चार भुजा धरि रूप अनूपा। ज्ञान दीप जग सुखद स्वरूपा॥ १८ ॥
करहु कृपा माँ मो पर भारी। बिपति नसावहु विघ्न बिदारी॥ १९ ॥
नाथ सकल सुख भक्ति ही दीजै। संकट हरन दया अब कीजै॥ २० ॥
तुमरी महिमा को जग जानै। सुर मुनि सब तुमको सरहानै॥ २१ ॥
विघ्न विनासन मङ्गलकारी। जय जय जय संतोषी सुखकारी॥ २२ ॥
जो यह पाठ करै चित लाई। ताकी बिपति सब दूरि जाई॥ २३ ॥
रामदास धरि ध्यान तिहारो। संकट में प्रभु तुमहिं संभारो॥ २४ ॥
करहु कृपा बाबा कल्याना। दीजै मोहिं विद्या अरु ज्ञाना॥ २५ ॥
विघ्न हरन मङ्गल के दाता। तुम ही मेरे भाग्य विधाता॥ २६ ॥
जय जय जय संतोषी माता। पाठ समाप्त भयउ सुख दाता॥ २७ ॥
संतत सम्पति तुमरी दासी। पाप ताप सब दूरि बिलासी॥ २८ ॥
नित्य पाठ जो करैं तुम्हारा। सो नर पावै भव सों पारा॥ २९ ॥
प्रेम भक्ति सों जो जस गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै॥ ३० ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताको छुटि जाई॥ ३१ ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन कृपा तुम्हारी॥ ३२ ॥
आशा तृष्णा विपत सतावै। मोह मदादिक सब बिनसावै॥ ३३ ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौ इकचित तुम्हें भवानी॥ ३४ ॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥ ३५ ॥
संतोषी चालीसा जो गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥ ३६ ॥
देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३७ ॥
जय जय जय जगदम्ब भवानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३८ ॥
सकल मनोरथ पूरण कीजै। दासन को वर अभय दीजै॥ ३९ ॥
जय जय संतोषी आदि भवानी। तुम हो त्रिभुवन की महारानी॥ ४० ॥
दोहा
संतोषी चालीसा विमल यह, जो जन करैं विचार।
तिन्ह कहँ सब सुख सम्पति मिलै, उपजै बुद्धि अपार॥
सुंदर दास दास को जानि, कीजै प्रभु कल्यान।
संकट हरन मङ्गल करन, दीजै विद्या ज्ञान॥
॥ इति श्री संतोषी माता चालीसा समाप्त ॥
