श्री अलोपी माता चालीसा (Shri Alopi Mata Chalisa)

श्री अलोपी माता चालीसा (Shri Alopi Mata Chalisa) - Shubh Tokri

श्री अलोपी माता चालीसा का संपूर्ण हिंदी पाठ यहां पढ़ें।

चालीसा पाठ

दोहा

सुमिरि अलोपी मात पद, सुर मुनि शीश नवाहिं।

चालीसा वर्णन करूँ, मो कहँ ज्ञान दे जाहिं॥

प्रयागराज संगम तटै, अलोपीबाग निवास।

झूलत पालना रूप में, पूरण कीजै आस॥

चौपाई

जय जय अलोपी महारानी। जाकी महिमा जग ने जानी॥ १ ॥

सती रूप तुम आदि भवानी। शिव संग ब्याही जगत कल्यानी॥ २ ॥

दक्ष यज्ञ जब पिता रचायो। शिव का भाग वहाँ नहीं पायो॥ ३ ॥

क्रोधित हो तुम देह त्यागी। योग अग्नि में लीला जागी॥ ४ ॥

शव लेकर जब शिव अकुलाए। ताण्डव कर सब लोक डराए॥ ५ ॥

विष्णु चक्र तब तुरत चलाया। सती देह के अंग गिराया॥ ६ ॥

प्रयाग पीठ पर उंगली झारी। यहाँ गिरी कलाई प्यारी॥ ७ ॥

गिरते ही वह भई अलोपा। नाम अलोपी पायो चोखा॥ ८ ॥

मूर्ति नहीं कोई पिंड तुम्हारी। झूला झूलत मातु मुरारी॥ ९ ॥

काष्ठ पालना राजत नीका। मस्तक सोहै पावन टीका॥ १० ॥

रेशम डोर बंधी है भारी। दर्शन करत जाहिं नर नारी॥ ११ ॥

ऋद्धि-सिद्धि सब दासी तुम्हारी। तुम हो जग की पालनकारी॥ १२ ॥

जो जन तुमरो ध्यान लगावै। सो नर सब सुख सम्पति पावै॥ १३ ॥

दरिद्रता सब दूरि भगावै। अमृत रस घर में बरसावै॥ १४ ॥

अन्न धन के भण्डार भरती। भक्तन के संकट सब हरती॥ १५ ॥

सकल मनोरथ पूरण कीजै। दासन को वर अभय दीजै॥ १६ ॥

दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै। जो जन तुमरो जस नित गावै॥ १७ ॥

करहु कृपा माँ मो पर भारी। बिपति नसावहु विघ्न बिदारी॥ १८ ॥

नाथ सकल सुख भक्ति ही दीजै। संकट हरन दया अब कीजै॥ १९ ॥

तुमरी महिमा को जग जानै। सुर मुनि सब तुमको सरहानै॥ २० ॥

विघ्न विनासन मङ्गलकारी। जय जय जय अलोपी सुखकारी॥ २१ ॥

जो यह पाठ करै चित लाई। ताकी बिपति सब दूरि जाई॥ २२ ॥

रामदास धरि ध्यान तिहारो। संकट में प्रभु तुमहिं संभारो॥ २३ ॥

करहु कृपा माता कल्याना। दीजै मोहिं विद्या अरु ज्ञाना॥ २४ ॥

विघ्न हरन मङ्गल के दाता। तुम ही मेरे भाग्य विधाता॥ २५ ॥

जय जय जय अलोपी माता। पाठ समाप्त भयउ सुख दाता॥ २६ ॥

संतत सम्पति तुमरी दासी। पाप ताप सब दूरि बिलासी॥ २७ ॥

नित्य पाठ जो करैं तुम्हारा। सो जन पावै भव सों पारा॥ २८ ॥

प्रेम भक्ति सों जो जस गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै॥ २९ ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताको छुटि जाई॥ ३० ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। सिद्ध न हो बिन कृपा तुम्हारी॥ ३१ ॥

आशा तृष्णा विपत सतावै। मोह मदादिक सब बिनसावै॥ ३२ ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौ इकचित तुम्हें भवानी॥ ३३ ॥

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥ ३४ ॥

अलोपी चालीसा जो गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥ ३५ ॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३६ ॥

जय जय जय जगदम्ब भवानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३७ ॥

संगम स्नान जो करिके आवै। अलोपी दर्शन सों फल पावै॥ ३८ ॥

ज्ञान प्रकाश करहु तुम माई। जय जय जय अलोपी माँ सहाई॥ ३९ ॥

जय जय जय अलोपी भवानी। शरण गहे की राखो कानी॥ ४० ॥

दोहा

अलोपी चालीसा विमल, जो जन करैं विचार।

तिन्ह कहँ सब सुख सम्पति मिलै, उपजै बुद्धि अपार॥

सुंदर दास दास को जानि, कीजै मातु कल्यान।

संकट हरन मङ्गल करन, दीजै पावन ज्ञान॥

॥ इति श्री अलोपी माता चालीसा समाप्त ॥

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