श्री ललिता चालीसा (Shri Lalita Chalisa)

श्री ललिता चालीसा (Shri Lalita Chalisa) - Shubh Tokri

श्री ललिता चालीसा का संपूर्ण हिंदी पाठ यहां पढ़ें।

चालीसा पाठ

दोहा

जयति जयति जय ललिते माता, सुख कल्याणी आदि भवानी।

कृपा करहु अब मो पर अम्बा, तुम हो त्रिभुवन की महारानी॥

आदि शक्ति तुम आदि स्वरूपा, सुमिरत मिटत सकल अज्ञान।

शरणागत की रक्षा कीजै, दीजै विमल बुद्धि और ज्ञान॥

चौपाई

जय जय ललिते माता सुखकारी। तुम हो सकल जगत की प्यारी॥ १ ॥

त्रिपुरासुन्दरी नाम तिहारा। जाकी महिमा अपरम्पारा॥ २ ॥

चार भुजा धरि रूप अनूपा। ज्ञान दीप जग सुखद स्वरूपा॥ ३ ॥

पाश अङ्कुश तुम हाथ सँवारे। धनुष और बाण मनोहर धारे॥ ४ ॥

कनक सिंहासन मात बिराजै। अद्भुत तेज मुखमण्डल साजे॥ ५ ॥

वेद पुरानन महिमा गाई। सुर मुनि सबने सीस नवाई॥ ६ ॥

तुम सम कृपालु नहिं कोई दूजा। जग में होय तुम्हारी पूजा॥ ७ ॥

दीन दयाल तुमको जग जाना। संकट में प्रभु तुमहिं संभारो॥ ८ ॥

जो जन तुमरो ध्यान लगावै। सो नर सब सुख संपति पावै॥ ९ ॥

दरिद्रता सब दूरि भगावै। सुख संपति घर में लै आवै॥ १० ॥

ह्रीं क्लीं श्रीं यह मंत्र तिहारा। जो ध्यावै सो पावै पारा॥ ११ ॥

ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला। जब लगि जियौ दया फल पाला॥ १२ ॥

गले बीच सोहै मुक्ता माला। अद्भुत रूप मातु विशाला॥ १३ ॥

सुंदर बदन सोहनी मूरति। मुकुट रतन सिर साजे कीरति॥ १४ ॥

कमलासन पर मात बिराजै। अद्भुत तेज मुखमण्डल साजे॥ १५ ॥

करहु कृपा प्रभु मो पर भारी। बिपति नसावहु विघ्न बिदारी॥ १६ ॥

नाथ सकल सुख संपति दीजै। संकट हरन दया अब कीजै॥ १७ ॥

तुमरी महिमा को जग जानै। सुर मुनि सब तुमको सरहानै॥ १८ ॥

विघ्न विनासन मंगलकारी। जय जय जय प्रभु सुखकारी॥ १९ ॥

जो यह पाठ करै चित लाई। ताकी बिपति सब दूरि जाई॥ २० ॥

रामदास धरि ध्यान तिहारो। संकट में प्रभु तुमहिं संभारो॥ २१ ॥

करहु कृपा बाबा कल्याना। दीजै मोहिं विद्या अरु ज्ञाना॥ २२ ॥

विघ्न हरन मंगल के दाता। तुम ही मेरे भाग्य विधाता॥ २३ ॥

जय जय जय ललिते माता। पाठ समाप्त भयउ सुख दाता॥ २४ ॥

संतत संपति तुमरी दासी। पाप ताप सब दूरि बिलासी॥ २५ ॥

नित्य पाठ जो करै तुम्हारा। सो नर पावै भव सों पारा॥ २६ ॥

प्रेम भक्ति सों जो जस गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै॥ २७ ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताको छुटि जाई॥ २८ ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन कृपा तुम्हारी॥ २९ ॥

आशा तृष्णा विपत सतावै। मोह मदादिक सब बिनसावै॥ ३० ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौ इकचित तुम्हें भवानी॥ ३१ ॥

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥ ३२ ॥

ललिता चालीसा जो गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥ ३३ ॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३४ ॥

जय जय जय जगदम्ब भवानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ ३५ ॥

सकल मनोरथ पूरण कीजै। दासन को वर अभय दीजै॥ ३६ ॥

श्री विद्या का ज्ञान करावहु। भव सागर से पार लगावहु॥ ३७ ॥

करहु कृपा माँ राजराजेश्वरी। तुम ही हो सब जग की ईश्वरी॥ ३८ ॥

जय जय ललिते आदि भवानी। तुम हो त्रिभुवन की महारानी॥ ३९ ॥

सकल मनोरथ पूरण कीजै। दासन को वर अभय दीजै॥ ४० ॥

दोहा

ललिता चालीसा विमल यह, जो जन करैं विचार।

तिन्ह कहँ सब सुख संपति मिलै, उपजै बुद्धि अपार॥

सुंदर दास दास को जानि, कीजै प्रभु कल्यान।

संकट हरन मंगल करन, दीजै विद्या ज्ञान॥

॥ इति श्री ललिता चालीसा समाप्त ॥

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