श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa)

श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa) - Shubh Tokri

श्री गणेश चालीसा का संपूर्ण हिंदी पाठ यहां पढ़ें।

चालीसा पाठ

दोहा

जय गणपति सदगुन सदन, कवन सुकृत सिर नय।

कहुँ बुधि बल बरनन करौ, नायक बुद्धि सकल्य॥

जय जय जय गणनायक, जन सुखदायक भाल।

बसहुँ चतुर भुज रूप धरि, उर महँ दीनदयाल॥

चौपाई

जय जय गिरिजापति नंदन। जय जय लंबोदर जग बंदन॥ १ ॥

जय जय गनपति गनराजू। मंगल भरण करन सुभ काजू॥ २ ॥

अति सुचि सुंदर रूप बिराजै। कंचन मुकुट सुभग सिर साजै॥ ३ ॥

कानन कुंडल अति सुभ सोहे। मुख मस्तक छबि सब मन मोहे॥ ४ ॥

सुंदर सुंड सुसोभित देहा। गंड स्थल मद चूइ सनेहा॥ ५ ॥

चारि भुजाहिं सोभित कर भारी। मुदगर पाश धरें एक धारी॥ ६ ॥

एक दंत अति बुद्धि बिसाला। तिहुँ पुर जय जय रटत कपाला॥ ७ ॥

मूषक बाहन सोभित नीका। महा प्रताप बदन पर टीका॥ ८ ॥

भक्त हेतु तुम संकट धाये। सब सुख देइ असुर सँहारे॥ ९ ॥

तुमरी महिमा को बरनै का। बुध बिद्या सब तुमहिं ते पाई॥ १० ॥

तुमरी गती कछु लखी न जाई। ब्रह्मादिक सब सीस नवाई॥ ११ ॥

रिद्धि सिद्धि तुमरी चेरी सब। कारज सिद्ध करौ प्रभु तुम अब॥ १२ ॥

बिघ्न हरन जय मंगल मूरति। तिहुँ पुर छाई तुमरी कीरति॥ १३ ॥

तुमरी कृपा भयउ जग ग्याता। दुख दरिद्र सब मिटइ बिधाता॥ १४ ॥

जो जन तुमरो ध्यान लगावै। सो नर सब सुख संपति पावै॥ १५ ॥

बिघ्न बिनासन नाम तिहारो। संकट में प्रभु तुमहिं संभारो॥ १६ ॥

लंबोदर सोभित भुज चारी। जय जन रंजन असुर सँहारी॥ १७ ॥

एक दंत छबि अद्‍भुत भारी। जय जय जय गनपति सुखकारी॥ १८ ॥

रिद्धि सिद्धि चँवर डुलावैं। सुर नर मुनि सब सीस नवावैं॥ १९ ॥

करहु कृपा प्रभु दीनदयाल। संकट हरहु गनपति भूपाल॥ २० ॥

तुमरी महिमा बेद बखानै। सुर मुनि कोउ मरम न जानै॥ २१ ॥

परबती के सुत जग बंदन। कारज सिद्ध करहु दुख भंजन॥ २२ ॥

बिघ्न हरन मंगल के दाता। तुम ही सखा पिता और माता॥ २३ ॥

सकट चौथ व्रत करैं जो कोई। ताके घर महँ संकट न होई॥ २४ ॥

करैं पाठ जो चालीसा पावन। सो नर पावइ मोच्छ सुभावन॥ २५ ॥

विद्या बुद्धि लहइ सोई ज्ञानी। जाकी कृपा करैं कल्यानी॥ २६ ॥

धन धान्य सब बिधि सुख पावै। जो नित गनपति के गुन गावै॥ २७ ॥

भाद्रपद सुदी चौथ सयानी। जो जन करैं पाठ मन मानी॥ २८ ॥

ताके काज सिद्ध सब होई। बिघ्न न ब्यापै ता कहँ कोई॥ २९ ॥

बिघ्न हरन मंगल के रूपा। जय जय जय गनपति भूपूपा॥ ३० ॥

करहु कृपा प्रभु मो पर भारी। बिपति नसावहु बिघ्न बिदारी॥ ३१ ॥

नाथ सकल सुख संपति दीजै। संकट हरन दया अब कीजै॥ ३२ ॥

लंबोदर छबि सुंदर सोहै। देखत रूप सकल मन मोहै॥ ३३ ॥

तुमरी महिमा को जग जानै। सुर मुनि सब तुमको सरहानै॥ ३४ ॥

बिघ्न बिनासन मंगलकारी। जय जय जय गनपति सुखकारी॥ ३५ ॥

जो यह पाठ करै चित लाई। ताकी बिपति सब दूरि जाई॥ ३६ ॥

रामदास धरि ध्यान तिहारो। संकट में प्रभु तुमहिं संभारो॥ ३७ ॥

करहु कृपा गनपति कल्याना। दीजै मोहिं बिद्या अरु ग्याना॥ ३८ ॥

बिघ्न हरन मंगल के दाता। तुम ही मेरे भाग्य बिधाता॥ ३९ ॥

जय जय जय गनपति सुभकारी। पाठ समाप्त भयउ सुखकारी॥ ४० ॥

दोहा

श्री गणेश चालीसा विमल, जो जन करैं विचार।

तिन्ह कहँ सब सुख संपति मिलै, उपजै बुद्धि अपार॥

सुंदर दास दास को जानि, कीजै प्रभु कल्यान।

संकट हरन मंगल करन, दीजै बिद्या ग्यान॥

॥ इति श्री गणेश चालीसा समाप्त ॥

Scroll to Top